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गुरु की शरण में मन की शांति

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पल-पल बदलते मन के भाव न केवल मन को विचलित करते हैं, बल्कि मस्तिष्क को भी बेचैन रखते हैं। मानव मन का स्वभाव है कि वह हर परिस्थिति को स्वयं से जोड़कर विचारशील हो जाता है। कभी भविष्य की चिंता, कभी अतीत का पश्चाताप और कभी वर्तमान की उलझन—इन सबके बीच मन सदैव एक स्थिर आधार खोज में रहता है। आज का युग सुविधाओं से सम्पन्न युग है, जिसमें बाहरी सुख-समृद्धि भले ही प्राप्त हो जाएं परन्तु भीतर की शांति कहीं खोती जा रही है। मन जितना बाहर भागता है, उतना ही भीतर खालीपन बढ़ता है। ऐसे समय में प्रश्न उठता है—क्या मन की इस चंचलता का कोई स्थायी समाधान है? जिससे उसका भटकाव कम हो और उसका मन शांत हो। ऐसे में अध्यात्म का मार्ग उसे स्थिरता देने का काम करता है। गुरु का महत्व- जो ज्ञान के पथ का मार्ग दिखाए वह "गुरु"। भारतीय परंपरा में गुरु को अज्ञान के अंधकार को दूर करने वाला प्रकाश कहा गया है। संत परंपरा में भी गुरु को जीवन-नैया का सारथी माना गया है। प्रसिद्ध संत शिरोमणि  कबीरदास जी  ने भी कहा है - “गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाय।” यह पंक्ति गुरु के उस महत्व को दर्शाती है, जो हमें ईश्व...

संत रविदास : प्रेम, समता और मानवता के संत

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“रविदास ऐसे संत थे, जिनसे ईश का भाव पढ़ाया। जात-पात का भेद मिटा, सबको गले लगाया।” (प्रवीन) ये पंक्तियाँ केवल काव्य नहीं हैं, बल्कि उस महान संत के जीवन-दर्शन का सार हैं, जिन्होंने समाज को ईश्वर से जोड़ने का सरल और सच्चा मार्ग दिखाया। संत रविदास भक्ति आंदोलन के ऐसे उज्ज्वल स्तंभ थे, जिनकी वाणी आज भी मानवता को दिशा देती है। ईश्वर भक्ति का सरल मार्ग संत रविदास आडंबर के विरुद्ध थे। उन्होंने ईश्वर को मंदिरों, कर्मकांडों या बाहरी आडंबरों तक सीमित नहीं माना। उनके अनुसार सच्ची भक्ति हृदय की पवित्रता, प्रेम और करुणा में निहित है। उनके लिए ईश्वर का भाव किसी विशेष वर्ग या जाति का अधिकार नहीं था, बल्कि हर मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार था। जाति-पात के विरुद्ध निर्भीक स्वर जिस समय समाज कठोर जाति-भेद में जकड़ा हुआ था, उस समय संत रविदास ने निर्भीक होकर समानता का संदेश दिया। उन्होंने कर्म को प्रधान माना, जन्म को नहीं। उनका जीवन इस बात का प्रमाण था कि मनुष्य की महानता उसके विचारों और आचरण से तय होती है, न कि उसकी सामाजिक पहचान से। सच्चे अर्थ में जाति - पात का फेर सिर्फ इस लोक की देन है। ईश्वर के...

सत्य ही शिव है

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सत्यम और सुंदर का सार शिव में समाहित है जब हम महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर “शिव” का स्मरण करते हैं, तो केवल एक देवता की आराधना नहीं करते, बल्कि उस सत्य और सौंदर्य का ध्यान करते हैं जो सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त है। सत्यम — अर्थात् जो अटल है, शाश्वत है, जिसे कोई बदल नहीं सकता। सुंदर — अर्थात् जो मन को शांति दे, आत्मा को प्रसन्न करे, और जीवन में संतुलन लाए। शिव इन दोनों का अद्भुत संगम हैं। 🔱 शिव — सत्य के प्रतीक सत्य कभी आडंबरपूर्ण नहीं होता। वह सरल होता है, निर्विकार होता है। शिव भी ऐसे ही हैं — भस्म-विभूषित, व्याघ्र-चर्म धारण किए, पर्वतों में विराजमान। वे हमें सिखाते हैं कि बाहरी दिखावा नहीं, भीतर की निर्मलता ही असली सत्य है। जब मन अहंकार से मुक्त होता है, तब शिव तत्व प्रकट होता है। 🌙 शिव — सौंदर्य के भी आधार सौंदर्य केवल रूप में नहीं, बल्कि भाव में होता है। शिव के मस्तक पर चंद्रमा है, जटाओं में गंगा बहती है, कंठ में विष है, और मुख पर करुणा। विरोधाभासों के बीच भी जो संतुलन बना ले — वही सच्चा सुंदर है। शिव हमें सिखाते हैं कि जीवन के विष को भी धारण करके, संसार को अमृत देना...

बिना गुरु क्या अध्यात्म संभव है?

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क्या आत्मा की परमात्मा तक की यात्रा बिना किसी मार्गदर्शक के पूरी हो सकती है? यह एक ऐसा प्रश्न है जो सदियों से साधकों के मन को विचलित करता रहा है। अध्यात्म की राह व्यक्तिगत भी है और सार्वभौमिक भी। यह भीतर की यात्रा है, जहाँ व्यक्ति स्वयं से मिलना चाहता है। पर क्या यह यात्रा अकेले संभव है?इसका जवाब जानने के लिए साधक मन को अपने भीतर झांकने की आवश्यकता होती है। अध्यात्म का बीज भीतर है अध्यात्म बाहर का नहीं अंतर का विषय है। जिसका बीज हर मनुष्य के भीतर पहले से विद्यमान होता है। अध्यात्म की राह पर चलने वाले मानव को अपने अंतरमन को टटोलने की जरूरत है। हमारी अंतरात्मा हमें संकेत देती है—क्या सही है, क्या गलत; क्या स्थायी है और क्या क्षणभंगुर है। जब मनुष्य संसार की चकाचौंध से थककर भीतर की ओर देखता है, तभी अध्यात्म की शुरुआत होती है। इस दृष्टि से देखें तो यात्रा का आरंभ स्वयं से ही होता है।इसे कभी भी बाहर नहीं खोजा जा सकता। अध्यात्म मार्ग सरल नहीं है अध्यात्म का पथ साधारण दृष्टि से भले ही सीधा दिखाई देता है, पर भीतर से अत्यंत सूक्ष्म और जटिल होता है।कभी -कभी मन सही दिशा नहीं समझता और ग...

दुःख अध्यात्म का प्रवेश द्वार क्यों बन जाता है?

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क्या जीवन में आने वाला दुःख हमें तोड़ने आता है, या हमें स्वयं से मिलाने? दुःख जीवन का सार है। दुःख उस विकट परिस्थिति का नाम है, जिससे निकलकर ही जीव जीवन को समझने लगता है। सुख के क्षणों में मनुष्य बाहरी संसार में उलझा रहता है—आकांक्षाएँ, उपलब्धियाँ और इच्छाएँ उसे भीतर झाँकने नहीं देतीं। पर जब दुःख आता है, तब वही मनुष्य ठहरकर सोचने को विवश हो जाता है। यही ठहराव अध्यात्म की पहली सीढ़ी बनता है। जीवन का यह ठहराव उसके अंतरमन में न केवल विचारशीलता को जन्म देता बल्कि उसे भविष्य में खुद को एक सशक्त व्यक्तित्व के रूप में उभारने का काम भी करता है। दुःख और आत्मचिंतन जीवन में आने वाला दुःख एक सीख लेकर आता है। दुःख मनुष्य के अहंकार को तोड़ता है और उसकी सीमाओं का बोध कराता है। वह प्रश्न खड़े करता है—मैं कौन हूँ? मेरा अस्तित्व क्या है? क्या यह जीवन केवल सुख‑दुःख का क्रम मात्र है? इन्हीं प्रश्नों के साथ आत्मा पहली बार संसार से हटकर स्वयं की ओर देखने लगती है। खुद को खोजने का प्रयास करती है। अध्यात्म की ओर पहला कदम जीवन में सुख और दुःख समय - समय पर लौटकर आते रहते हैं। जहां एक तरफ सुख हमें सां...

“शिक्षा: सिर्फ़ नौकरी का साधन या जीवन निर्माण की प्रक्रिया?”

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क्या शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी पाना है, या वह हमारे पूरे जीवन की दिशा तय करने वाली शक्ति भी है? शिक्षा वह गहरा समुद्र है, जिसमें डूबने वाला न केवल नौकरी की चाह रखता है, बल्कि अपने आने वाले भविष्य के विषय में भी चिंतित रहता है। यह समुद्र जितना आकर्षक है, उतना ही गंभीर भी—क्योंकि इसमें उतरने वाला व्यक्ति अपने जीवन की दिशा, पहचान और उद्देश्य को खोजने की कोशिश करता है। आज के दौर की शिक्षा को देखा जाए तो यह धीरे‑धीरे अंकों, डिग्रियों और पैकेज तक सीमित होती जा रही है, जबकि इसका वास्तविक उद्देश्य इससे कहीं अधिक व्यापक और गहन है। शिक्षा का वास्तविक अर्थ सही अर्थ में देखा जाए तो शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान या परीक्षा में उत्तीर्ण होने का नाम नहीं है। बल्कि यह वह प्रक्रिया है जो मनुष्य के सोचने, समझने और निर्णय लेने की क्षमता को विकसित करती है। शिक्षा हमें सही‑गलत में भेद करना सिखाती है, हमारे अंतरमन में छिपि संवेदना जगाती है और हमें समाज के प्रति हमारे उत्तरदायित्व का बोध कराती है। जब शिक्षा सिर्फ़ नौकरी बन जाए आज का समाज पहले जैसा नहीं रहा।आज जहां एक तरफ व्यक्ति की सोच बदली है व...

खामोशी: शब्दों से परे अंतरमन की भाषा

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"खामोशी शब्दों की भाषा है, चुप रहकर बहुत कुछ कहती है। अंतरमन के भावों को, चुप रहकर सहती है।" जब शब्द भावों को व्यक्त करने में सफल न हों तब खामोशी सब कुछ कह जाती है। आध्यात्मिक जीवन में खामोशी का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है।देखा यही गया है कि जहाँ शब्द सीमित हो जाते हैं, वहीं से मौन की अनुभूति प्रारंभ होती है। खामोशी केवल बोलने का अभाव नहीं, बल्कि चेतना की वह अवस्था है जहाँ मन ठहर जाता है और आत्मा मुखर हो उठती है। मानव मन निरंतर विचारों, इच्छाओं और स्मृतियों से भरा रहता है। मन के अंदर उठी हलचल,भीतर का यह शोर हमें स्वयं से दूर कर देता है। ऐसे में खामोशी वह द्वार बनती है, जिसके माध्यम से हम अपने भीतर प्रवेश कर पाते हैं। यह हमें सिखाती है कि हर उत्तर बाहर नहीं, भीतर ही छिपा होता है। खामोशी हमें हमारे अंतरमन में झांकने का अवसर प्रदान करती है। अनेक भाव ऐसे होते हैं जिन्हें शब्दों में बाँधना संभव नहीं होता। पीड़ा, करुणा, प्रेम और आत्मिक शांति—ये सब मौन में ही अपना वास्तविक रूप पाते हैं। खामोशी उन भावों को बिना प्रश्न किए स्वीकार कर लेती है। वह न तो निर्णय करती है और न ही ...