गुरु की शरण में मन की शांति
पल-पल बदलते मन के भाव न केवल मन को विचलित करते हैं, बल्कि मस्तिष्क को भी बेचैन रखते हैं। मानव मन का स्वभाव है कि वह हर परिस्थिति को स्वयं से जोड़कर विचारशील हो जाता है। कभी भविष्य की चिंता, कभी अतीत का पश्चाताप और कभी वर्तमान की उलझन—इन सबके बीच मन सदैव एक स्थिर आधार खोज में रहता है। आज का युग सुविधाओं से सम्पन्न युग है, जिसमें बाहरी सुख-समृद्धि भले ही प्राप्त हो जाएं परन्तु भीतर की शांति कहीं खोती जा रही है। मन जितना बाहर भागता है, उतना ही भीतर खालीपन बढ़ता है। ऐसे समय में प्रश्न उठता है—क्या मन की इस चंचलता का कोई स्थायी समाधान है? जिससे उसका भटकाव कम हो और उसका मन शांत हो। ऐसे में अध्यात्म का मार्ग उसे स्थिरता देने का काम करता है। गुरु का महत्व- जो ज्ञान के पथ का मार्ग दिखाए वह "गुरु"। भारतीय परंपरा में गुरु को अज्ञान के अंधकार को दूर करने वाला प्रकाश कहा गया है। संत परंपरा में भी गुरु को जीवन-नैया का सारथी माना गया है। प्रसिद्ध संत शिरोमणि कबीरदास जी ने भी कहा है - “गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाय।” यह पंक्ति गुरु के उस महत्व को दर्शाती है, जो हमें ईश्व...