“शिक्षा: सिर्फ़ नौकरी का साधन या जीवन निर्माण की प्रक्रिया?”


क्या शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी पाना है, या वह हमारे पूरे जीवन की दिशा तय करने वाली शक्ति भी है?

शिक्षा वह गहरा समुद्र है, जिसमें डूबने वाला न केवल नौकरी की चाह रखता है, बल्कि अपने आने वाले भविष्य के विषय में भी चिंतित रहता है। यह समुद्र जितना आकर्षक है, उतना ही गंभीर भी—क्योंकि इसमें उतरने वाला व्यक्ति अपने जीवन की दिशा, पहचान और उद्देश्य को खोजने की कोशिश करता है। आज के दौर की शिक्षा को देखा जाए तो यह धीरे‑धीरे अंकों, डिग्रियों और पैकेज तक सीमित होती जा रही है, जबकि इसका वास्तविक उद्देश्य इससे कहीं अधिक व्यापक और गहन है।

शिक्षा का वास्तविक अर्थ
सही अर्थ में देखा जाए तो शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान या परीक्षा में उत्तीर्ण होने का नाम नहीं है। बल्कि यह वह प्रक्रिया है जो मनुष्य के सोचने, समझने और निर्णय लेने की क्षमता को विकसित करती है। शिक्षा हमें सही‑गलत में भेद करना सिखाती है, हमारे अंतरमन में छिपि संवेदना जगाती है और हमें समाज के प्रति हमारे उत्तरदायित्व का बोध कराती है।

जब शिक्षा सिर्फ़ नौकरी बन जाए
आज का समाज पहले जैसा नहीं रहा।आज जहां एक तरफ व्यक्ति की सोच बदली है वहीं दूसरी तरफ शिक्षा व्यवस्था में भी बदलाव देखा जा सकता है। एक समय था जब पढ़ाई बोझ नहीं कुछ नया सीखने का नाम था, जबकि आज शिक्षा व्यवस्था में बच्चों से कम उम्र में ही यह अपेक्षा की जाने लगती है कि वे भविष्य में क्या बनेंगे—डॉक्टर, इंजीनियर, अफ़सर। इस दौड़ में यह नहीं देखा जाता कि बच्चा कैसा इंसान बन रहा है। परिणामस्वरूप, पढ़े‑लिखे होने के बावजूद संवेदनशीलता, नैतिकता और सामाजिक चेतना का अभाव दिखाई देता है।बालपन की नाज़ुक सोच पर यह गहन विचारधारा अपनी अमिट छाप भी छोड़ देती है।

जीवन निर्माण की भूमिका
हमें आने वाली पीढ़ी को यह बताने की आवश्यकता है कि यदि शिक्षा जीवन निर्माण की प्रक्रिया बने, तो वह व्यक्ति को केवल आत्मनिर्भर ही नहीं, बल्कि आत्मबोध से युक्त भी बनाती है। ऐसी शिक्षा मनुष्य को सहनशील, ईमानदार और करुणामय बनाती है। वह सिखाती है कि सफलता केवल व्यक्तिगत लाभ में नहीं, बल्कि समाज के हित में भी निहित है।सच कहूं तो शिक्षा वह द्वार है जो जीवन को आधार देता है।

गुरु की भूमिका
"गुरु ज्ञान का सार है, गुरु अमृत की धारा।
गुरु बिन जीवन ऐसा लगता, जैसे बिन पानी की धारा।".....(प्रवीन)
परंपरागत भारतीय शिक्षा में गुरु का स्थान केवल पढ़ाने वाले तक सीमित नहीं था। गुरु जीवन-पथ प्रदर्शक होता था—जो शिष्य के चरित्र, आचरण और दृष्टि का निर्माण करता था। आज आवश्यकता है कि शिक्षा में फिर से उस गुरु-तत्त्व को स्थान दिया जाए, ताकि ज्ञान के साथ संस्कार भी पनपें।

संतुलन की आवश्यकता
शिक्षा जीना सिखाती है परन्तु यह कहना भी उचित नहीं होगा कि नौकरी या आजीविका महत्वहीन है। जीवन के लिए आर्थिक स्थिरता आवश्यक है, लेकिन जब शिक्षा का एकमात्र लक्ष्य यही बन जाए, तो उसका संतुलन बिगड़ जाता है। आवश्यकता है ऐसी शिक्षा की, जो रोज़गार भी दे और जीवन-मूल्य भी। दोनों का संतुलन किसी के भी जीवन को भली-भांति संवार सकता है।

निष्कर्ष
निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि शिक्षा यदि केवल नौकरी का साधन बनकर रह जाएगी, तो समाज कुशल कर्मचारी तो पैदा करेगा, पर संवेदनशील नागरिक नहीं। लेकिन यदि शिक्षा को जीवन निर्माण की प्रक्रिया के रूप में अपनाया जाए, तो वह न केवल व्यक्ति का, बल्कि पूरे समाज का उत्थान कर सकती है।

शिक्षा उस गहरे समुद्र के समान है, जहाँ उतरने से पहले लक्ष्य स्पष्ट होना चाहिए और उतरने के बाद धैर्य भी। जो इस समुद्र में केवल रोज़गार की तलाश में उतरता है, वह किनारे तक सीमित रह जाता है, लेकिन जो जीवन को समझने की चाह लेकर उतरता है, वही इसकी गहराइयों में छिपे मोतियों को पा सकता है।

अतः आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि शिक्षा से क्या बनना है, बल्कि यह है कि शिक्षा के इस समुद्र में उतरकर हम कैसे इंसान बनकर उभरते हैं। एक अच्छे इंसान से ही अच्छे परिवार,अच्छे समाज और अच्छे देश की नींव मजबूत होती है।

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