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बाबा गुरिंदर सिंह ढिल्लों स्नेह की जीती-जागती मूरत 💞

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इस मानवीय दुनिया में शायद ही कोई ऐसा हो जो दुखित न हो।हर प्राणी को कभी न कभी स्नेह के अभाव का अनुभव अवश्य हो जाता है । कुछ लोगों का तो लगभग पूरा जीवन ही किसी के स्नेह, प्यार व अपनेपन के अहसास के बिना ही बीत जाता है। परन्तु यह स्काथित तब आती है जब उन्हें प्रारम्भ से ही किसी का प्यार नहीं मिलता, किसी से अपनेपन का अहसास नहीं मिलता। ऐसे में वह सभी लोगों से दूरी बनाना प्राप्त कर देता है।जिसका परिणाम यह निकलता है कि न तो वह खुद किसी का बन पाता है और न ही कोई उसका बन पाता है। जबकि हमें अपने हृदय का एक कोना सदैव दूसरे के लिए खुला रखना चाहिए ताकि हम किसी को दिल से अपना मान सके और वह भी हमें अपना समझे।जब हम किसी दिशा में क़दम बढ़ाते हैं तो निश्चित ही हमें एक सलाहकार की एक मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है।जो हमें सही दिशा दिखाएं और हमें आगे बढ़ने में मदद करें। जिससे लिए हमारे मार्गदर्शक दर्शक का सही होना भी परमावश्यक है। इसलिए जब भी हम सच्चे मार्गदर्शक की कल्पना करते हैं, तो मन में एक ऐसी छवि उभरती है जो केवल ज्ञान से ही नहीं, बल्कि प्रेम, करुणा और स्नेह से भी परिपूर्ण हो। ऐसे ही एक दिव...

"संतमत में नाम का महत्त्व"

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"राम नाम तू ले ले बन्दे, कष्टों से छुट जाएगा। अंत समय धन-दौलत सब छूटे,नाम ही संग जाएगा।"(प्रवीन) "नाम" के विषय में क्या ही कहूँ नाम आधार भी है " नाम" साधन भी है। यदि अपने चारों ओर देखें तो "नाम" पहचान है मानव समाज की। जब किसी को नाम से पुकारा जाता है, तो उम्मीद की जाती है कि वह आपकी आवाज़ पर प्रतिक्रिया दे। ताकि आप उससे जुड़ सकें,उसको अपनी बात बता सके। एक साधारण सी बात लगती है, लेकिन इसके भीतर एक गहरा आध्यात्मिक संकेत छुपा है। जिस प्रकार हम अपने नाम से जुड़ते हैं, उसी प्रकार आत्मा भी अपने असली "नाम" के माध्यम से परमात्मा से जुड़ती है। मनुष्य का जीवन बाहरी पहचान में बीत जाता है—नाम, प्रतिष्ठा, रिश्ते और जिम्मेदारियाँ। इन सबके बीच हम स्वयं को जानने का समय ही नहीं निकाल पाते। मन हर पल किसी न किसी विचार में उलझा रहता है, और भीतर की शांति धीरे-धीरे धुंधली हो जाती है। मन विचलित सा हो जाता है। ऐसे में जब जीवन प्रश्न पूछता है—"मैं कौन हूँ?"—तो उत्तर बाहर नहीं, भीतर की खोज द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है । संतमत इसी खोज क...

"मीरा की दीवानगी — भक्ति का सबसे निर्मल रूप"

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"मीरा दीवानी थी श्याम की, जैसे चंदा संग चितचोर, नाची थी वो प्रेम धुन पर, जैसा नाचा नहीं कोई और।" (प्रवीन) मीरा हर पल अपने प्रभु श्री कृष्ण के प्रेम में लीन रहती थीं।उनकी भक्ति उच्च श्रेणी में गिनी जाती है।यदि भक्ति की बात करें तो भक्ति जब अपने शुद्धतम स्वरूप में प्रकट होती है, तो वह किसी नियम, सीमा या सामाजिक बंधन को नहीं मानती। वह बस बहती जाती है — जैसे मीरा की भक्ति बहती थी। मीरा केवल कृष्ण की उपासक ही नहीं थीं, वे उनकी प्रेमिका, उनकी दासी, और उनकी पूर्ण समर्पित आत्मा थीं।  मीरा की दीवानगी कोई साधारण भावना नहीं थी। वह ऐसा प्रेम था, जिसमें ‘मैं’ का अस्तित्व ही मिट जाता है। जब मीरा कहती हैं कि “मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई,” तो यह केवल एक पंक्ति नहीं, बल्कि उनके पूरे जीवन का सार है। उन्होंने संसार की हर अपेक्षा, हर बंधन को त्यागकर केवल अपने आराध्य को चुना। उन्हें अपने ईष्ट के अतिरिक्त अन्य कोई दिखाई ही नहीं देता है। उनकी भक्ति साहस भरी थी।उनकी भक्ति में एक अद्भुत निडरता थी। समाज ने उन्हें रोका, परिवार ने विरोध किया, लेकिन मीरा के कदम कभी नहीं रुके। वे मंदिरों ...

💫इंसान में इंसानियत कहीं खो सी गई है✍️

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वक्त बदलता है, मौसम बदलते हैं और समय के साथ हर शख़्स भी बदलता है। बदलाव प्रकृति का नियम है—यह जीवन को गतिशील बनाता है, हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। परन्तु जब यही बदलाव हमारी मूल पहचान, हमारी संवेदनाओं और हमारी इंसानियत को ही पीछे छोड़ दे, तब यह एक गंभीर प्रश्न बन जाता है—क्या हम सही दिशा में बदल रहे हैं? यदि हम वर्तमान समय पर एक दृष्टि डालें तो हम पाते हैं कि आज इंसान ने विज्ञान, तकनीक और भौतिक सुख-सुविधाओं में अभूतपूर्व प्रगति कर ली है। जीवन पहले से अधिक आसान और तेज़ हो गया है। परन्तु इस दौड़ में कहीं न कहीं हम अपने भीतर की संवेदनशीलता, अपनापन और सहानुभूति को खोते जा रहे हैं। रिश्ते अब जरूरतों तक सीमित होते जा रहे हैं, और दिलों के बीच की दूरी दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। यदि यह बदलाव यूं ही बढ़ता रहा तो एक दिन इंसान खुद से भी दूर हो जाएगा। एक समय था जब एक की तकलीफ़ सब मिलकर सुलझाने का प्रयास करते थे।यही कारण था कि  पहले किसी के दुख में पूरा मोहल्ला साथ खड़ा हो जाता था, वहीं आज लोग एक-दूसरे की तकलीफ़ों से अनजान बने रहते हैं। किसी की मदद करना अब कर्तव्य नहीं, बल्कि व...

ईश्वर की खोज: बाहर नहीं, भीतर की यात्रा

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“क्यों ढूंढ रहा तू ईश्वर को, इस दुनिया के कोनों में, वह तो बसता दिल में तेरे, ढूंढ तू दिल के कोने में।” (प्रवीन) इस संसार में मनुष्य सदियों से ईश्वर की तलाश में भटकता फिर रहा है। कोई मंदिरों में जाता है, तो कोई मस्जिदों में सिर झुकाता है, कोई तीर्थों की यात्राएँ करता है। लेकिन विचार किया जाए तो क्या वास्तव में ईश्वर इन बाहरी स्थानों में ही सीमित है? या वह हमारे भीतर ही कहीं शांत बैठा हमारा इंतजार कर रहा है? 🌿 संतों की दृष्टि में ईश्वर भारत की संत परंपरा हमेशा से यह सिखाती आई है कि ईश्वर बाहर नहीं, भीतर है। कबीर दास ने कहा था — “ मोको कहाँ ढूंढे रे बंदे, मैं तो तेरे पास में।” परम संत कबीरदास जी के इन शब्दों में यह स्पष्ट संदेश है कि ईश्वर को पाने के लिए बाहरी दिखावे की नहीं, बल्कि आंतरिक जागरूकता की आवश्यकता है। इसी प्रकार गुरु नानक देव जी ने भी कहा — “ मन तू जोत स्वरूप है, अपना मूल पहचान।” अर्थात, मनुष्य के भीतर ही ईश्वर का प्रकाश विद्यमान है, बस उसे पहचानने की देर है। रूमी जैसे सूफी संत भी यही बताते हैं कि ईश्वर की तलाश में बाहर भटकने की बजाय, अपने हृदय की गहराइयों में उ...

अंतर की खोज: संगत से समर्पण तक का सफर

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"नैन खोल घट भीतर माहि, तभी मिलेगा फल मन चाहि। रूप अगम की धारा बहती, पीने जितना मन चाहि।"(प्रवीन) इन पंक्तियों में एक गहरी सच्चाई छुपी है—वह सच्चाई जिसे हम जीवन भर बाहर ढूंढते रहते हैं, जबकि उसका वास्तविक स्रोत हमारे अपने ही भीतर प्रवाहित हो रहा होता है। मनुष्य का स्वभाव है कि वह सुख, शांति और संतोष को बाहरी वस्तुओं, संबंधों और परिस्थितियों में तलाशता है। लेकिन संतमत एक ऐसा मार्ग है जो हमें अलग ही दिशा में ले जाता है—यह हमें हमारे अंतर के दर्शन करवाता है , हमें स्वयं की ओर लेकर जाता है। 🌿 बाहरी दुनिया से आंतरिक यात्रा तक हमारा जीवन अक्सर भाग-दौड़, इच्छाओं और अपेक्षाओं में उलझा रहता है। हर दिन हम कुछ पाने की चाह में लगे रहते हैं, लेकिन फिर भी एक अधूरापन मन के किसी कोने में बना रहता है। यही वह क्षण होता है जब भीतर से एक पुकार उठती है— " क्या यही सब है? या इससे आगे भी कुछ है?" यहीं से शुरू होती है अंतर की खोज—एक ऐसी यात्रा, जो बाहर से नहीं, भीतर से पूरी होती है। 🙏 संगत का प्रभाव: सोच से अनुभव तक इस यात्रा में सबसे पहला और महत्वपूर्ण कदम होता है...

महावीर स्वामी के सिद्धांत में विश्व कल्याण का समावेश

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दिशा जीवन में आगे बढ़ने का रास्ता दिखाती है।यह दिशा हमें हमारे माता-पिता से भी मिलती है और गुरुजनों से भी। मानव इतिहास में कुछ ऐसे महापुरुष हुए हैं, जिनके विचार केवल एक युग या समाज तक सीमित नहीं रहे, बल्कि सम्पूर्ण विश्व के लिए मार्गदर्शक बने। महावीर स्वामी ऐसे ही महान आत्मा थे, जिनके सिद्धांत आज भी विश्व कल्याण की दिशा में प्रकाश स्तंभ की तरह कार्य कर रहे हैं। अहिंसा: विश्व शांति का आधार "अहिंसा" महावीर स्वामी का सबसे प्रमुख सिद्धांत है। उनका मानना था कि हर जीव में आत्मा होती है, इसलिए किसी भी जीव को कष्ट पहुँचाना स्वयं को कष्ट देने के समान है। आज के समय में, जब विश्व हिंसा और संघर्षों से जूझ रहा है, अहिंसा का यह संदेश वैश्विक शांति की नींव रख सकता है। अनेकांतवाद: विचारों में सहिष्णुता महावीर स्वामी ने अनेकांतवाद का सिद्धांत दिया, जिसका अर्थ है कि सत्य को कई दृष्टिकोणों से समझा जा सकता है। यह विचार हमें सिखाता है कि दूसरों की बातों को समझना और स्वीकार करना आवश्यक है। आज के विभाजित समाज में यह सिद्धांत सहिष्णुता और आपसी सम्मान को बढ़ावा देता है। अपरिग्रह: संतुलित ...