"मीरा की दीवानगी — भक्ति का सबसे निर्मल रूप"
"मीरा दीवानी थी श्याम की, जैसे चंदा संग चितचोर,
नाची थी वो प्रेम धुन पर, जैसा नाचा नहीं कोई और।"
(प्रवीन)
मीरा हर पल अपने प्रभु श्री कृष्ण के प्रेम में लीन रहती थीं।उनकी भक्ति उच्च श्रेणी में गिनी जाती है।यदि भक्ति की बात करें तो भक्ति जब अपने शुद्धतम स्वरूप में प्रकट होती है, तो वह किसी नियम, सीमा या सामाजिक बंधन को नहीं मानती। वह बस बहती जाती है — जैसे मीरा की भक्ति बहती थी। मीरा केवल कृष्ण की उपासक ही नहीं थीं, वे उनकी प्रेमिका, उनकी दासी, और उनकी पूर्ण समर्पित आत्मा थीं।
मीरा की दीवानगी कोई साधारण भावना नहीं थी। वह ऐसा प्रेम था, जिसमें ‘मैं’ का अस्तित्व ही मिट जाता है। जब मीरा कहती हैं कि “मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई,” तो यह केवल एक पंक्ति नहीं, बल्कि उनके पूरे जीवन का सार है। उन्होंने संसार की हर अपेक्षा, हर बंधन को त्यागकर केवल अपने आराध्य को चुना। उन्हें अपने ईष्ट के अतिरिक्त अन्य कोई दिखाई ही नहीं देता है।
उनकी भक्ति साहस भरी थी।उनकी भक्ति में एक अद्भुत निडरता थी। समाज ने उन्हें रोका, परिवार ने विरोध किया, लेकिन मीरा के कदम कभी नहीं रुके। वे मंदिरों में नाचती थीं और गलियों में गाती थीं।उनकी हर श्वास में कृष्ण का नाम बसा था। उनका नृत्य केवल शरीर का नहीं था, वह आत्मा का उत्सव था — एक ऐसा उत्सव जिसमें प्रेम ही संगीत था और समर्पण ही लय।
मीरा की भक्ति हमें एक संदेश देती है कि हमें अपने प्यार के प्रति पूर्ण समर्पण करना होगा तभी हमारी भक्ति कारगर साबित होगी । मीरा की भक्ति हमें यह सिखाती है कि सच्चा प्रेम पाने के लिए हमें त्याग करना पड़ता है। यह प्रेम स्वार्थ से परे होता है। इसमें पाने की इच्छा नहीं, बल्कि खो जाने की तृप्ति होती है। मीरा ने कुछ पाने के लिए भक्ति नहीं की, उन्होंने खुद को खो देने के लिए भक्ति की — और शायद यही कारण है कि वे आज भी अमर हैं।
आज के समय में, जब भक्ति भी कई बार दिखावे का रूप ले लेती है, मीरा हमें सच्चाई की राह दिखाती हैं। वे हमें याद दिलाती हैं कि भक्ति का अर्थ केवल पूजा या प्रार्थना नहीं, बल्कि अपने भीतर उस प्रेम को जगाना है, जो हर परिस्थिति में अडिग रहे।
वह अपने प्रिय कृष्ण से जिद्द नहीं करती बल्कि उनसे प्रार्थना करती हैं कि वह उनकी अर्जी सुन लें और उनकी रक्षा करें।
अंत में, मीरा की यही दीवानगी उन्हें विशेष बनाती है — एक ऐसी दीवानगी, जो पागलपन नहीं, बल्कि परम ज्ञान का रूप है। क्योंकि जब इंसान ईश्वर में पूरी तरह खो जाता है, तभी वह ईश्वर को सच में पा लेता है और उसकी सभी परेशानियां समाप्त हो जाती हैं। सुख दुख आते जाते रहते हैं, लेकिन प्रभु प्रेम में लीन व्यक्ति एक समभाव को अपनाना सीख जाता है।जो उसे जीवन की बड़ी से बड़ी विकट परिस्थिति में भी संभाल लेता है।बस इंसान को यह ध्यान रखना चाहिए कि जब कोई उसके साथ नहीं खड़ा होता तब प्रभु से प्रेम ही उसका बेड़ा पार लगाते हैं।उसकी समस्या का समाधान करते हैं।अंत में मैं बस यही कहना चाहूंगी -
"जो डूबा प्रभु प्रेम में, वो पार हुआ हर दौर,
भक्ति का ऐसा रंग चढ़े,रंग न ऐसा कोई और।(प्रवीन)
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें