दुःख अध्यात्म का प्रवेश द्वार क्यों बन जाता है?
दुःख जीवन का सार है। दुःख उस विकट परिस्थिति का नाम है, जिससे निकलकर ही जीव जीवन को समझने लगता है। सुख के क्षणों में मनुष्य बाहरी संसार में उलझा रहता है—आकांक्षाएँ, उपलब्धियाँ और इच्छाएँ उसे भीतर झाँकने नहीं देतीं। पर जब दुःख आता है, तब वही मनुष्य ठहरकर सोचने को विवश हो जाता है। यही ठहराव अध्यात्म की पहली सीढ़ी बनता है। जीवन का यह ठहराव उसके अंतरमन में न केवल विचारशीलता को जन्म देता बल्कि उसे भविष्य में खुद को एक सशक्त व्यक्तित्व के रूप में उभारने का काम भी करता है।
दुःख और आत्मचिंतन
जीवन में आने वाला दुःख एक सीख लेकर आता है।
दुःख मनुष्य के अहंकार को तोड़ता है और उसकी सीमाओं का बोध कराता है। वह प्रश्न खड़े करता है—मैं कौन हूँ? मेरा अस्तित्व क्या है? क्या यह जीवन केवल सुख‑दुःख का क्रम मात्र है? इन्हीं प्रश्नों के साथ आत्मा पहली बार संसार से हटकर स्वयं की ओर देखने लगती है। खुद को खोजने का प्रयास करती है।
अध्यात्म की ओर पहला कदम
जीवन में सुख और दुःख समय - समय पर लौटकर आते रहते हैं। जहां एक तरफ सुख हमें सांसारिक मोह की तरफ लेकर जाता है वहीं दूसरी तरफ दुःख हमारे लिए अध्यात्म के दरवाज़े खोलने का काम करता है। अध्यात्म दुःख को नकारता नहीं, बल्कि उसे समझने की दृष्टि देता है। वह सिखाता है कि दुःख दंड नहीं, चेतना का जागरण है। जब संसार के सहारे कमजोर पड़ने लगते हैं, तब आत्मा किसी ऐसे सत्य की खोज करती है जो स्थायी हो। यही खोज आत्मा को परमात्मा की ओर ले जाती है।
आत्मा और परमात्मा का संबंध
वास्तव में दुःख हमें अपने आप से मिलाता है।
दुःख की अवस्था में आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने लगती है। वह जानती है कि वह केवल शरीर या परिस्थितियों तक सीमित नहीं है। इसी बोध में परमात्मा की उपस्थिति का अनुभव होता है—एक ऐसा अनुभव, जो शब्दों से परे है,।सच से रुबरू होने पर मन में अपार शांति का अनुभव होता है।
गुरु कृपा की भूमिका
आत्मा और परमात्मा के बीच का यह मार्ग गुरु के बिना अधूरा है। गुरु कृपा वह दीपक है, जो दुःख के अंधकार में प्रकाश फैलाता है। गुरु यह बोध कराते हैं कि दुःख कोई अभिशाप नहीं, बल्कि परमात्मा की ओर से दिया गया संकेत है—आत्मा को उसकी वास्तविक पहचान से जोड़ने का माध्यम।
"गुरु ज्ञान का दीप जलाकर , देते ज्ञान अपार।
अज्ञान तिमिर हर लेते, करते भव से पार।"(प्रवीन)
दुःख से साधना तक
गुरु के मार्गदर्शन से जीव का अध्यात्म सफ़र आसान हो जाता है।वह न केवल ईश्वर प्राप्ति के मार्ग पर चलता है बल्कि जीवन के सुख - दुःख में भी सामंजस्य बैठा लेता है। इतना ही जब आत्मा गुरु के शरणागत होकर दुःख को स्वीकार करती है, तब वही दुःख साधना बन जाता है। पीड़ा प्रार्थना में बदल जाती है और जीवन का प्रत्येक अनुभव परमात्मा से जुड़ने का अवसर बन जाता है। तब मनुष्य समझ पाता है कि अध्यात्म किसी विशेष स्थान या अवस्था में नहीं, बल्कि टूटन और मौन के क्षणों में जन्म लेता है। यहीं से जीव साधारण जीव से ऊपर उठकर सोचने समझने लगता है।
निष्कर्ष
सही अर्थ में देखा जाए तो दुःख वास्तव में अध्यात्म का प्रवेश द्वार है। यह वह द्वार है, जहाँ से आत्मा संसार के शोर से निकलकर परमात्मा की शांति में प्रवेश करती है। गुरु कृपा के सहारे आत्मा इस मार्ग पर चलना सीखती है और अंततः उसी सत्य में विश्राम पाती है, जहाँ दुःख भी अर्थपूर्ण हो जाता है और जीवन साधना में परिवर्तित हो जाता है। दुःख ही दुःख से निकलने का रास्ता खोल देता है। सुख में भले ही इंसान उस परमात्मा को याद न करें परन्तु दुःख उसे अध्यात्म की राह पर अवश्य ही लाकर खड़ा है देता है।
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