बिना गुरु क्या अध्यात्म संभव है?

क्या आत्मा की परमात्मा तक की यात्रा बिना किसी मार्गदर्शक के पूरी हो सकती है?
यह एक ऐसा प्रश्न है जो सदियों से साधकों के मन को विचलित करता रहा है। अध्यात्म की राह व्यक्तिगत भी है और सार्वभौमिक भी। यह भीतर की यात्रा है, जहाँ व्यक्ति स्वयं से मिलना चाहता है। पर क्या यह यात्रा अकेले संभव है?इसका जवाब जानने के लिए साधक मन को अपने भीतर झांकने की आवश्यकता होती है।
अध्यात्म का बीज भीतर है
अध्यात्म बाहर का नहीं अंतर का विषय है। जिसका बीज हर मनुष्य के भीतर पहले से विद्यमान होता है। अध्यात्म की राह पर चलने वाले मानव को अपने अंतरमन को टटोलने की जरूरत है। हमारी अंतरात्मा हमें संकेत देती है—क्या सही है, क्या गलत; क्या स्थायी है और क्या क्षणभंगुर है। जब मनुष्य संसार की चकाचौंध से थककर भीतर की ओर देखता है, तभी अध्यात्म की शुरुआत होती है। इस दृष्टि से देखें तो यात्रा का आरंभ स्वयं से ही होता है।इसे कभी भी बाहर नहीं खोजा जा सकता।
अध्यात्म मार्ग सरल नहीं है
अध्यात्म का पथ साधारण दृष्टि से भले ही सीधा दिखाई देता है, पर भीतर से अत्यंत सूक्ष्म और जटिल होता है।कभी -कभी मन सही दिशा नहीं समझता और ग़लत को सही मानकर उस ओर चल पड़ता है।यह मार्ग ऐसा है कि यहां अहंकार भी साधु का वेश धारण कर सकता है, और कल्पना को अनुभव समझ लेने का भ्रम भी हो सकता है।जब मन स्वयं को ही मार्गदर्शक मान लेता है, तो भटकाव की संभावना बढ़ जाती है।
यहीं गुरु की आवश्यकता अनुभव होती है।
गुरु की भूमिका
गुरु अध्यात्म के सफ़र का ज्ञाता और पारखी होता है।
वह सिर्फ उपदेश देने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह चेतना का जाग्रत स्रोत होता है। गुरु साधक को यह नहीं बताते कि परमात्मा कहाँ है—वे साधक को यह दिखाते हैं कि परमात्मा की खोज कहाँ और कैसे करनी है।वह साधक को अध्यात्म के मार्ग पर चलने का  रास्ता दिखाते हैं।
गुरु की कृपा उस दीपक की तरह है, जो साधक के भीतर पहले से जल रहे प्रकाश को स्थिर और प्रखर कर देती है। वे भ्रम और वास्तविक अनुभव के बीच का अंतर स्पष्ट करते हैं।जब साधक इस मार्ग पर आगे बढ़ता है तो उसे अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। गुरु साधक को इस मार्ग के काँटों से बचाते हैं और लक्ष्य की ओर बढ़ने का रास्ता खोलते हैं।
क्या बिना गुरु कुछ भी संभव नहीं?
अध्यात्म के सफ़र के कुछ ऐतिहासिक पन्नों को देखें तो इतिहास में ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहाँ आत्मचिंतन और तपस्या के माध्यम से कुछ साधकों ने सत्य का अनुभव किया। परंतु यह मार्ग अत्यंत कठिन, दीर्घ और जोखिमपूर्ण होता है। बिना गुरु के साधना संभव तो हो सकती है, पर उसमें दिशा की स्पष्टता कम और भ्रम की संभावना अधिक रहती है।
जैसे कोई व्यक्ति अज्ञात वन में अकेला प्रवेश करे—वह चल तो सकता है, पर मार्गदर्शक के बिना उसे भटकने का खतरा अधिक होगा। लेकिन जब गुरु उसका हाथ थाम कर उसे दिशा दिखाते हैं तो वह निःसंकोच उस पर चलकर लक्ष्य हासिल कर सकता है।
आत्मा, परमात्मा और गुरु
आत्मा उस परमात्मा का ही अंश है। इसलिए आत्मा में परमात्मा से मिलने की स्वाभाविक प्यास दिखाई देती है। यह प्यास ही अध्यात्म का मूल है। पर उस प्यास को सही स्रोत तक पहुँचाने का कार्य गुरु करते हैं। गुरु आत्मा और परमात्मा के बीच सेतु का काम करते हैं।
वे हमें यह बोध कराते हैं कि परमात्मा बाहर नहीं, भीतर ही है—और उस भीतर तक पहुँचने का मार्ग अनुशासन, साधना और समर्पण से होकर जाता है।जब इन तीनों का मेल हो जाता है तब आत्मा और परमात्मा एक रूप हो जाते हैं।
निष्कर्ष
अध्यात्म का सफ़र अंतरमन की चेतना का नाम है।
अध्यात्म की यात्रा का प्रारंभ भीतर से होता है, पर उसकी पूर्णता गुरु कृपा से ही होती है। बिना गुरु के अध्यात्म असंभव नहीं, पर कठिन और अनिश्चित अवश्य है।
जैसे नदी में समुद्र तक पहुँचने की प्रवृत्ति स्वाभाविक होती है, पर उसे सही दिशा और प्रवाह का सहारा चाहिए—वैसे ही आत्मा में परमात्मा से मिलने की आकांक्षा जन्मजात है, पर गुरु उस आकांक्षा को सार्थक दिशा देते हैं।इसे ऐसे ही समझा जा सकता है जैसे नाव के बैठी सवारी को मंजिल तो पता है परन्तु बिना खेवटिया के वह मंजिल तक नहीं पहुंच सकता।साधक को भी गुरु रूपी खेवटिया की आवश्यकता होती है। जिसके वह भवसागर पार कर सकें।
अतः कहा जा सकता है—
"जीवन है एक भंवर जाल,
बिन गुरु न कोई उतरे पार।
नाम की नैया थामे गुरु,
ले जाए भवसागर के पार।"(प्रवीन)
निष्कर्ष यहीं निकलता है कि अध्यात्म का बीज आत्मा में है, पर उसका पुष्प गुरु कृपा से ही खिलता है। 🌼

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