गुरु की शरण में मन की शांति
पल-पल बदलते मन के भाव न केवल मन को विचलित करते हैं, बल्कि मस्तिष्क को भी बेचैन रखते हैं। मानव मन का स्वभाव है कि वह हर परिस्थिति को स्वयं से जोड़कर विचारशील हो जाता है। कभी भविष्य की चिंता, कभी अतीत का पश्चाताप और कभी वर्तमान की उलझन—इन सबके बीच मन सदैव एक स्थिर आधार खोज में रहता है।
आज का युग सुविधाओं से सम्पन्न युग है, जिसमें बाहरी सुख-समृद्धि भले ही प्राप्त हो जाएं परन्तु भीतर की शांति कहीं खोती जा रही है। मन जितना बाहर भागता है, उतना ही भीतर खालीपन बढ़ता है। ऐसे समय में प्रश्न उठता है—क्या मन की इस चंचलता का कोई स्थायी समाधान है? जिससे उसका भटकाव कम हो और उसका मन शांत हो। ऐसे में अध्यात्म का मार्ग उसे स्थिरता देने का काम करता है।
गुरु का महत्व-
जो ज्ञान के पथ का मार्ग दिखाए वह "गुरु"। भारतीय परंपरा में गुरु को अज्ञान के अंधकार को दूर करने वाला प्रकाश कहा गया है। संत परंपरा में भी गुरु को जीवन-नैया का सारथी माना गया है। प्रसिद्ध संत शिरोमणि कबीरदास जी ने भी कहा है-
“गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाय।”
यह पंक्ति गुरु के उस महत्व को दर्शाती है, जो हमें ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग दिखाते हैं।
गुरु केवल उपदेश देने वाले नहीं होते, वे जीवन को देखने की दृष्टि बदल देते हैं। जब दृष्टिकोण बदलता है, तब परिस्थितियाँ वही रहते हुए भी मन की प्रतिक्रिया बदल जाती है। यही परिवर्तन शांति की पहली सीढ़ी है।
शरण का वास्तविक अर्थ
गुरु की शरण लेना केवल नाम लेने या बाहरी आडंबर तक सीमित नहीं है। शरण का अर्थ है—
👉अपने अहंकार को नम्र करना
👉मार्गदर्शन को स्वीकार करना
👉विश्वास के साथ चलना
जब मन स्वयं को किसी उच्च शक्ति के संरक्षण में अनुभव करता है, तब उसका भय कम होने लगता है। चिंता का बोझ हल्का होता है, क्योंकि उसे यह विश्वास होता है कि वह अकेला नहीं है। कोई है जो हर परिस्थिति में उसे संभालने के लिए खड़ा है। शिष्य का यह विश्वास उसे बाहरी ही नहीं आन्तरिक तौर पर भी मजबूत बनाता है।
मन की शांति कैसे मिलती है?
✍️नाम और ध्यान – नियमित साधना मन को केंद्रित करती है।उसे विचलित होने से रोकती है।
✍️सत्संग और सद्विचार – सकारात्मक संगति मन के विकारों को शांत करती है।
✍️सेवा और विनम्रता – जब मन “मैं” से “हम” की ओर बढ़ता है, तो अशांति घटती है। अहंकार का नाश होता है और विनम्रता उत्पन्न होती है।
मन की तुलना अक्सर अर्जुन से की जाती है, जो युद्धभूमि में भ्रमित था। जैसे अर्जुन को कृष्ण ने ज्ञान देकर स्थिर किया, वैसे ही गुरु जीवन के संघर्षों में हमारा मार्गदर्शन करते हैं।तभी वह उचित और अनुचित के फेर से निकल पाता है।
निष्कर्ष
मानसिक शांति बाहर की वस्तु नहीं है, जिसे बाजार से खरीदा जा सके। वह भीतर की अवस्था है, जो विश्वास, समर्पण और साधना से विकसित होती है। गुरु की शरण में मन को वह आधार मिलता है, जहाँ संदेह शांत हो जाते हैं और विश्वास जागृत होता है।
जब मन गुरु-वचनों पर स्थिर हो जाता है, तब परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों, भीतर एक स्थायी संतुलन बना रहता है।जो मनुष्य को एक ठहराव देता है।मन बैचैनी या भय को छोड़ स्थिरता को अपना लेता है—यही है गुरु की शरण में मन की सच्ची शांति।अंत में यही कहना चाहूंगी -
“जब मन अपने तर्कों से हार जाता है,
तब गुरु का विश्वास ही उसे जीतना सिखाता है।
शरण में झुका हुआ मस्तक ही
जीवन की उलझनों से थका हुआ मस्तक भी,
गुरु चरणों में आकर शांति का अनुभव पाता है।”(प्रवीन)
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