खामोशी: शब्दों से परे अंतरमन की भाषा

"खामोशी शब्दों की भाषा है, चुप रहकर बहुत कुछ कहती है।
अंतरमन के भावों को, चुप रहकर सहती है।"
जब शब्द भावों को व्यक्त करने में सफल न हों तब खामोशी सब कुछ कह जाती है। आध्यात्मिक जीवन में खामोशी का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है।देखा यही गया है कि जहाँ शब्द सीमित हो जाते हैं, वहीं से मौन की अनुभूति प्रारंभ होती है। खामोशी केवल बोलने का अभाव नहीं, बल्कि चेतना की वह अवस्था है जहाँ मन ठहर जाता है और आत्मा मुखर हो उठती है।
मानव मन निरंतर विचारों, इच्छाओं और स्मृतियों से भरा रहता है। मन के अंदर उठी हलचल,भीतर का यह शोर हमें स्वयं से दूर कर देता है। ऐसे में खामोशी वह द्वार बनती है, जिसके माध्यम से हम अपने भीतर प्रवेश कर पाते हैं। यह हमें सिखाती है कि हर उत्तर बाहर नहीं, भीतर ही छिपा होता है। खामोशी हमें हमारे अंतरमन में झांकने का अवसर प्रदान करती है।
अनेक भाव ऐसे होते हैं जिन्हें शब्दों में बाँधना संभव नहीं होता। पीड़ा, करुणा, प्रेम और आत्मिक शांति—ये सब मौन में ही अपना वास्तविक रूप पाते हैं। खामोशी उन भावों को बिना प्रश्न किए स्वीकार कर लेती है। वह न तो निर्णय करती है और न ही अपेक्षा रखती है।
आध्यात्मिक साधना में मौन केवल एक अभ्यास नहीं, बल्कि जीवन की एक अवस्था बन जाता है। जब साधक मौन को अपनाता है, तब वह धीरे-धीरे अपने विचारों का साक्षी बनने लगता है। यही साक्षी भाव आत्मबोध की ओर पहला कदम होता है।
खामोशी हमें सहनशील बनाती है। जब शब्दों का सहारा नहीं होता, तब मन भीतर ही स्थिर होना सीखता है। इस स्थिरता में अहंकार क्षीण होता है और स्वीकार का भाव जन्म लेता है। यही स्वीकार हमें भीतर से हल्का और मुक्त बनाता है।
संतों और महापुरुषों ने मौन को सर्वोच्च साधना कहा है कहा, क्योंकि मौन में ही सत्य स्वयं को प्रकट करता है। वहाँ कोई तर्क नहीं होता, कोई विवाद नहीं होता—केवल अनुभव होता है। यही अनुभव आध्यात्मिक यात्रा की सच्ची पहचान है।
अंततः यह समझना आवश्यक है कि खामोशी पलायन नहीं, बल्कि आत्मा से संवाद है। जो व्यक्ति मौन में उतरना सीख लेता है, वह जीवन के कोलाहल में भी शांत रहना सीख जाता है। यही खामोशी की सबसे बड़ी साधना है।
ख़ामोश रहकर हम उस मुश्किल घड़ी में भी राह निकाल लेते हैं जहां बाकी प्रयास विफल हो जाते हैं। कुछ लोग भले ही खामोशी को कमजोरी मानते हों,पर खामोशी कमजोरी का नाम नहीं। खामोशी तो साधना है एक ताकत है।जो उस वक्त भी एक हथियार का काम करती है जब अल्फ़ाज़ संवाद नहीं कर पाते।मन की शांति और आत्मा की मुख्यता भी इसी से जुड़ी हुई है।
अतः अंत में मैं यही करूंगी-
"खामोशी में जीवन का सार, पलभर में आ जाता है।
भीतर की आवाज़ से ही, हर उत्तर मिल जाता है।"

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

बिना गुरु क्या अध्यात्म संभव है?

दुःख अध्यात्म का प्रवेश द्वार क्यों बन जाता है?

सत्य ही शिव है