सत्य ही शिव है

सत्यम और सुंदर का सार शिव में समाहित है
जब हम महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर “शिव” का स्मरण करते हैं, तो केवल एक देवता की आराधना नहीं करते, बल्कि उस सत्य और सौंदर्य का ध्यान करते हैं जो सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त है।
सत्यम — अर्थात् जो अटल है, शाश्वत है, जिसे कोई बदल नहीं सकता।
सुंदर — अर्थात् जो मन को शांति दे, आत्मा को प्रसन्न करे, और जीवन में संतुलन लाए।
शिव इन दोनों का अद्भुत संगम हैं।
🔱 शिव — सत्य के प्रतीक
सत्य कभी आडंबरपूर्ण नहीं होता। वह सरल होता है, निर्विकार होता है।
शिव भी ऐसे ही हैं — भस्म-विभूषित, व्याघ्र-चर्म धारण किए, पर्वतों में विराजमान।
वे हमें सिखाते हैं कि बाहरी दिखावा नहीं, भीतर की निर्मलता ही असली सत्य है।
जब मन अहंकार से मुक्त होता है, तब शिव तत्व प्रकट होता है।
🌙 शिव — सौंदर्य के भी आधार
सौंदर्य केवल रूप में नहीं, बल्कि भाव में होता है।
शिव के मस्तक पर चंद्रमा है, जटाओं में गंगा बहती है, कंठ में विष है, और मुख पर करुणा।
विरोधाभासों के बीच भी जो संतुलन बना ले — वही सच्चा सुंदर है।
शिव हमें सिखाते हैं कि जीवन के विष को भी धारण करके, संसार को अमृत देना ही वास्तविक सुंदरता है।
✨ शिव — सत्य और सुंदर का संगम
सत्य कठोर हो सकता है, सुंदर कोमल हो सकता है;
परंतु शिव दोनों का संतुलित रूप हैं।
उनमें तप भी है, करुणा भी।
वैराग्य भी है, प्रेम भी।
संहार भी है, सृजन भी।
यही कारण है कि शिव केवल पूजनीय देव नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन हैं।
🕯 निष्कर्ष
महाशिवरात्रि की यह रात्रि हमें स्मरण कराती है कि
यदि हम अपने भीतर सत्य को स्वीकार कर लें
और अपने आचरण को सुंदर बना लें,
तो शिव हमारे बाहर नहीं, हमारे भीतर प्रकट हो जाएंगे।
“सत्यम शिवम सुंदरम् —
यह केवल मंत्र नहीं,
जीवन जीने की कला है।”

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