संत रविदास : प्रेम, समता और मानवता के संत
“रविदास ऐसे संत थे, जिनसे ईश का भाव पढ़ाया।
जात-पात का भेद मिटा, सबको गले लगाया।” (प्रवीन)
ये पंक्तियाँ केवल काव्य नहीं हैं, बल्कि उस महान संत के जीवन-दर्शन का सार हैं, जिन्होंने समाज को ईश्वर से जोड़ने का सरल और सच्चा मार्ग दिखाया। संत रविदास भक्ति आंदोलन के ऐसे उज्ज्वल स्तंभ थे, जिनकी वाणी आज भी मानवता को दिशा देती है।
ईश्वर भक्ति का सरल मार्ग
संत रविदास आडंबर के विरुद्ध थे। उन्होंने ईश्वर को मंदिरों, कर्मकांडों या बाहरी आडंबरों तक सीमित नहीं माना। उनके अनुसार सच्ची भक्ति हृदय की पवित्रता, प्रेम और करुणा में निहित है। उनके लिए ईश्वर का भाव किसी विशेष वर्ग या जाति का अधिकार नहीं था, बल्कि हर मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार था।
जाति-पात के विरुद्ध निर्भीक स्वर
जिस समय समाज कठोर जाति-भेद में जकड़ा हुआ था, उस समय संत रविदास ने निर्भीक होकर समानता का संदेश दिया। उन्होंने कर्म को प्रधान माना, जन्म को नहीं। उनका जीवन इस बात का प्रमाण था कि मनुष्य की महानता उसके विचारों और आचरण से तय होती है, न कि उसकी सामाजिक पहचान से। सच्चे अर्थ में जाति - पात का फेर सिर्फ इस लोक की देन है। ईश्वर के दरबार में सब एक समान है।
सबको गले लगाने की भावना
संत रविदास की सबसे बड़ी विशेषता थी — समावेशिता। उन्होंने किसी को ठुकराया नहीं, और न ही किसी को छोटा समझा। प्रेम, करुणा और भाईचारे का भाव उनके विचारों का केंद्र था। वे मानते थे कि जब तक समाज का अंतिम व्यक्ति सम्मान और प्रेम से नहीं जीता, तब तक आध्यात्मिक उन्नति अधूरी है। सम्मान और प्रेम वह भाव हैं जो इंसान को इंसान से जोड़ने का काम तो बखूबी करते ही हैं साथ ही इंसान को ईश्वर से जोड़ने का भी काम करते हैं।
आज के समय में प्रासंगिकता
आज के समय में जब उनकी वाणियों की प्रासंगिकता पर विचार किया जाए तो आज, जब समाज फिर से भेदभाव, अहंकार और विभाजन की ओर बढ़ रहा है, संत रविदास के विचार पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हैं। उनकी शिक्षाएँ हमें याद दिलाती हैं कि मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है, और प्रेम ही ईश्वर तक पहुँचने का सच्चा मार्ग।
निष्कर्ष
संत रविदास केवल एक संत नहीं थे, वे सामाजिक चेतना के दीपक थे। उन्होंने ईश्वर को इंसान से जोड़ा और इंसान को इंसान से। उनकी वाणी आज भी हमें यही सिखाती है कि —
जहाँ प्रेम है, वहीं ईश्वर है।
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