अहंकार: विनाश का कारण
कहते हैं मानव जीवन अन्य सभी श्रेणियों से श्रेष्ठ है। क्योंकि संतों ने माना है कि इस योनि में ईश्वर की आराधना सरल होती है। मनुष्य सोचने समझने की क्षमता रखता है अतः वह अपना भला-बुरा अच्छे से सोच पाता है। एक सही दिशा का चुनाव करके मनुष्य अपने जीवन को काफी हद तक सुखमय बना सकता है या यूं कहें कि वह सही दिशा पाकर प्रेम व शांति के पथ को अपनाकर सुख का अनुभव करने लगता है। जीवन में दुख कभी ख़त्म नहीं होते परन्तु अध्यात्म की दुनिया सुख और दुख को समभाव कर देती है। परन्तु यदि मनुष्य इससे विमुख हो क्रोध, अहंकार और ईर्ष्या की और उन्मुख हो जाता है तो उनका प्रतिफल भी उसे ही भोगना पड़ता है। विनम्रता और अंहकार हमें अलग अलग पथ पर ले जा आते हैं।मनुष्य का जीवन जितना सुंदर विनम्रता से बनता है, उतना ही अहंकार से बिगड़ जाता है। मेरा तो यही कहना है -
“विनाशक है अहंम भाव, न इसको संवारिये।
गुरु ज्ञान को साधकर, इसको संभालिए।” (प्रवीन)
अहंकार वह अदृश्य दीमक है, जो धीरे-धीरे व्यक्ति के विवेक, संबंधों और सुख-शांति को खोखला कर देता है। जब मनुष्य स्वयं को सबसे श्रेष्ठ मानने लगता है, तब उसके भीतर सीखने की क्षमता समाप्त होने लगती है। यही स्थिति उसके पतन का कारण बनती है।
अहंकार केवल धन, पद या शक्ति का नहीं होता, बल्कि ज्ञान, सुंदरता, धर्म और त्याग का अहंकार भी उतना ही घातक होता है। कई बार व्यक्ति यह सोचने लगता है कि उसके बिना कोई कार्य संभव ही नहीं हो सकता।उसकी इस भावना में भी अहंकार समाहित होता है।उसकी यही भावना उसे दूसरों से दूर कर देती है। धीरे-धीरे जब मन में अहंकार छाने लगता है तब रिश्तों में कटुता आने लगती है और मन अशांत रहने लगता है।अशांत मन से किया कोई भी काम सफलता के मार्ग में मुश्किलें खड़ी कर सकता है।
प्रकृति भी हमें यही शिक्षा देती है।यदि हम फलों से लदे हुए वृक्ष को देखें तो पाएंगे कि फलों से लदा हुआ वृक्ष हमेशा झुका रहता है, जबकि सूखा वृक्ष अकड़कर खड़ा रहता है। इसी प्रकार महान व्यक्ति विनम्र होते हैं। जिनके भीतर सच्चा ज्ञान होता है, वे कभी घमंड नहीं करते। ज्ञानी हमेशा हमें ज्ञान द्वारा उसको का हित ही करता है। अहंकार व्यक्ति को क्षणिक सुख तो दे सकता है, परन्तु स्थायी सम्मान कभी नहीं दिला सकता।
यदि हम इतिहास के पन्नों को पलट कर देखेंगे तो हमें ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाते हैं जहां अहंकार ही विनाश का कारण बना है। धार्मिक कथाओं में भी अहंकार के विनाशकारी परिणाम देखने को मिलते हैं। रावण अत्यंत विद्वान और शक्तिशाली था, लेकिन उसके अहंकार ने उसे पतन की ओर धकेल दिया। वहीं दूसरी ओर, विनम्रता और सेवा भाव रखने वाले लोग आज भी आदर के साथ याद किए जाते हैं।
अहंकार का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव यह है कि यह मनुष्य को सत्य से दूर कर देता है।वह भ्रमित होकर
हर परिस्थिति में स्वयं को सही समझने लगता है।
उसे अपनी गलतियाँ दिखाई नहीं देतीं। वह सलाह सुनना बंद कर देता है और धीरे-धीरे अकेला पड़ जाता है। इसलिए समय रहते अपने भीतर झाँकना आवश्यक है।
इस कार्य के लिए गुरु हमारे मार्गदर्शक का कार्य करते हैं। गुरु का ज्ञान अहंकार को मिटाने का सबसे सरल मार्ग है। गुरु हमें यह समझाते हैं कि मनुष्य केवल कर्म का अधिकारी है, श्रेष्ठता का नहीं। जब व्यक्ति गुरु वचनों को जीवन में उतारता है, तब उसके भीतर विनम्रता, प्रेम और सहनशीलता का विकास होता है।
वास्तव में, विनम्रता कमजोरी नहीं बल्कि सबसे बड़ी ताकत है। जो व्यक्ति झुकना जानता है, वही जीवन में आगे बढ़ता है। अहंकार हमें दूसरों से अलग करता है, जबकि प्रेम और नम्रता सबको जोड़ने का काम करते हैं।
अंततः यही कहा जा सकता है कि अहंकार विनाश का द्वार है और विनम्रता विकास का मार्ग। यदि जीवन में सुख, शांति और सम्मान चाहिए, तो हमें अपने भीतर के अहंकार को पहचानकर उसे गुरु ज्ञान और आत्मचिंतन से नियंत्रित करना होगा। तभी जीवन वास्तव में सुंदर और सार्थक बन सकेगा। सार्थक जीवन ही सफलता की कुंजी है। अतः अंहकार को त्यागकर गुरु चरणों में स्नेह बनाए रखिए और जीवन में सफलता का स्वाद चखते रखिए।
अध्यात्म/ज्ञान/शिक्षा ब्लॉग/-प्रवीन ✍️
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