"मन के हारे हार है,मन के जीते जीत"

"मन मेरा बावरा, समझाऊँ समझे नाहिं।
इत-उत डोलत फिरे, गुरु चरणों में नाहिं।" (प्रवीन)
"मन" की प्रवृत्ति में भटकाव शामिल हैं।भले ही यह एक सच्चे साथी की तरह हर पल हमारे साथ रहता है पर हमें सबसे अधिक भटकाने का काम भी यही करता है। यह कभी हमें सपनों की ऊँचाइयों पर ले जाता है, तो कभी निराशा की अंधेरी गलियों में भटका देता है। मन की यही चंचलता हमारे जीवन का सबसे बड़ा संघर्ष बन जाती है। शायद यही कारण है कि गुरु जन कहते हैं "मन के हारे हार है, मन के जीते जीत" —उनकी यह बात मात्र एक कहावत नहीं, बल्कि जीवन का सार है।
यदि हम अपने जीवन पर दृष्टि डालें तो हम पाते हैं कि हमारे जीवन में जो कुछ भी घटित होता है, उसकी पहली प्रतिक्रिया हमारे मन में ही जन्म लेती है। वही प्रतिक्रिया आगे चलकर हमारे निर्णयों और कर्मों का रूप लेती है।
विकट परिस्थितियों का सामना करके जब मन हार मान लेता है, तो व्यक्ति बाहरी दुनिया से पहले भीतर ही टूट जाता है। फिर हर चुनौती असंभव लगने लगती है, हर प्रयास अधूरा रह जाता है। लेकिन वहीं इसके उलट जब मन दृढ़ हो जाए, संकल्प से भर जाए, तब वही व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में भी राह बना लेता है।उसकी सफलता उसके मन के दृढ़ संकल्प का परिणाम बनती है।
अक्सर हम अपनी असफलताओं के लिए भाग्य, परिस्थितियों या दूसरों को दोष देते हैं। पर सच्चाई यह है कि हमारी सबसे बड़ी लड़ाई बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर चल रही होती है।
अगर हम इस भीतरी युद्ध को जीत लें, तो बाहरी जीत अपने आप हमारे कदम चूमने लगती है। संभव है कभी कभी असफलता का सामना भी करना पड़े परन्तु हम प्रयासशील रहे यह भी सफलता का ही अंश है।
यह सत्य है कि मन को साधना आसान नहीं, क्योंकि यह स्वभाव से ही चंचल है। यह पल भर में भटक जाता है—कभी इच्छाओं के पीछे, कभी डर के पीछे, तो कभी मोह और माया के जाल में उलझ जाता है।
ऐसे में इसे संभालने के लिए एक स्थिर आधार की आवश्यकता होती है।
जैसा कि उपरोक्त पंक्तियाँ संकेत करती हैं—जब मन गुरु के चरणों में टिक जाता है, तब उसे एक दिशा मिलती है। उसमें एक ठहराव आ जाता है।
गुरु का मार्गदर्शन मन की भटकन को शांत करता है, उसे स्थिरता देता है और जीवन को सही राह पर ले आता है।
हमारे भीतर उत्पन्न भक्ति, विश्वास और सकारात्मक विचार—ये तीन ऐसे स्तंभ हैं, जिनके आधार पर मजबूत मन का निर्माण होता है।
जब हम अपने भीतर इन भावों को विकसित करते हैं, तब जीवन के कठिन क्षण भी हमें कमजोर नहीं कर पाते, बल्कि हमें और अधिक परिपक्व बना देते हैं।
जीवन में हार और जीत तो आती-जाती रहती है, पर महत्वपूर्ण यह है कि हम उन्हें कैसे देखते हैं।
अगर हम हार को अंत समझ लें, तो वही हमारी पराजय बन जाती है।
लेकिन अगर हम उसे एक सीख मान लें, तो वही हार हमारी अगली जीत की नींव बन जाती है।
सच तो यह है कि मन की शक्ति अपार है।
यह हमें ऊँचाइयों तक पहुँचा सकता है और गहराइयों में भी गिरा सकता है।
इसलिए जरूरी है कि हम इसे समझें, इसे नियंत्रित करें और इसे सही दिशा में लगाएँ।
हर न‌ए दिन,न‌ई सुबह के साथ यह हमें एक नया अवसर देता है—अपने मन को फिर से संभालने का, अपने विचारों को सकारात्मक बनाने का और अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने का।बस हमें उस संकेत को समझकर उसे अपनाना मात्र है।
अंततः यही कहा जाएगा मन जीवन को दिशा देता है,जीवन का सार यही है—
अगर मन स्थिर है, तो परिस्थितियाँ हमें हिला भी नहीं सकतीं;
और अगर मन डगमगाए, तो सरल रास्ते भी कठिन लगने लगते हैं।
इसलिए प्रयास करें मन को कभी हारने न दें।
उसे विश्वास, भक्ति और सकारात्मकता से भरें।
क्योंकि जब मन जीत जाता है,
तभी सच्ची जीत हमारे जीवन में उतरती है।

अंत में बस इतना ही -
जीत लिया जिसने मन को, मानों उसने जग जीत लिया।
अंधियारे पथ को उसने, ख़ुद से ही रौशन किया।(प्रवीन)

अध्यात्म/भक्ति/शिक्षा -ब्लॉग/-प्रवीन

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