गुरु मार्ग दिखाते हैं, चलना हमें होता है

"गुरु मार्ग दिखाते हैं, चलना हमें होता है।
जीवन के सफ़र में,संवरना ख़ुद को होता है ।।" (प्रवीन)
"गुरु" एक दीप के समान होता है। जैसे दीप अपने प्रकाश से अंधेरा दूर करता है ठीक वैसे ही "गुरु" अज्ञान के अंधकार में प्रकाश करते हैं। वे सत्य का संकेत करते हैं, भीतर की आँख खोलते हैं, परंतु साधना का पथ शिष्य को स्वयं ही तय करना होता है। गुरु कृपा बरसाते हैं, पर उस कृपा को जीवन में समेटकर , संजोकर रखने का प्रयास साधक को करना पड़ता है।साधक का काम "गुरु" द्वारा दिखाए मार्ग पर चलना होता है।
आध्यात्म में गुरु का कार्य बाहरी नहीं, भीतरी होता है। वे मन की उलझनों को पहचानना सिखाते हैं, अहंकार की परतें दिखाते हैं और आत्मा को सही दिशा की ओर चलने की प्रेरणा देते हैं। गुरु ने राह दिखाई किंतु साधक को मन को साधना भी होता है, विकारों से संघर्ष भी करना होता है और निरंतर अभ्यास भी करना होता है।
गुरु आंतरिक तौर पर आध्यात्मिक सफ़र में अपने शिष्य के साथ होता है, परन्तु वह (गुरु) बिना प्रयास के मोक्ष नहीं देते। वे मार्ग बताते हैं, विधि समझाते हैं, अनुभव की दिशा देते हैं, परंतु हर कदम पर जागरूक रहना साधक की जिम्मेदारी है। यदि शिष्य स्वयं नहीं चलता, तो गुरु का दिया हुआ ज्ञान भी बोझ बन जाता है।
यह शिष्य का फ़र्ज़ है कि वह गुरु के बताएं मार्ग पर चले।जब शिष्य गुरु के बताए मार्ग पर चलने लगता है, तब गुरु की कृपा स्वतः फलित होने लगती है। उस समय गुरु बाहर नहीं, भीतर मार्गदर्शक बन जाते हैं। साधक और साध्य के बीच की दूरी धीरे-धीरे मिटने लगती है।वह एक रूप होने लगते हैं।
शिष्य यदि अध्यात्म के क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहता है, सफलता पाना चाहता है तो गुरु द्वारा दिए गए ज्ञान व दिशा को जीवन में उतारने की आवश्यकता होती है। अतः आध्यात्मिक जीवन में हमें यह समझना होगा कि गुरु हमें निर्भर नहीं बनाते, बल्कि आत्मबोध की ओर ले जाते हैं। सत्य यही है कि मार्ग दिखाना गुरु का धर्म है और उस मार्ग पर चलना शिष्य की साधना।इसी साधना द्वारा शिष्य अपना लक्ष्य पा सकता है।

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