मार्गदर्शन:सही दिशा,सही भविष्य
जब किसी व्यक्ति को दिशा दिखाई जाती है, तो वह उस ओर आगे बढ़ने का प्रयास करता है। बिना दिशा के किया गया परिश्रम अक्सर भटकाव में बदल जाता है, जबकि सही मार्गदर्शन को आधार मानकर किया गया साधारण प्रयास भी किसी को सार्थक बना देता है।
यूं तो छात्र जीवन प्रथम कक्षा से ही प्रारंभ हो जाता है, फिर कक्षा नर्सरी की हो या पहली की छात्र परिवार की चाहरदीवारी से बाहर कुछ सीखना चाहता है। छात्र जीवन में, विशेषकर 10वीं कक्षा के समय, यह बात और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।इस कक्षा का छात्र सीखने के साथ ही अपनी प्रथम कठिन परिक्षा में उत्तीर्ण भी होना चाहता है। यह वह चरण होता है जहाँ पढ़ाई का दबाव, अपेक्षाएँ और भविष्य को लेकर भ्रम एक साथ सामने आते हैं। ऐसे समय में केवल मेहनत ही नहीं, बल्कि सही दिशा की भी आवश्यकता होती है।
ऐसे में उचित मार्गदर्शन मिल आए तो सफलता पाना आसान हो जाता है। मार्गदर्शन का अर्थ आदेश देना नहीं, बल्कि समझाना होता है। एक अच्छा मार्गदर्शक विद्यार्थी की क्षमता को पहचानता है और उसी के अनुसार उसे आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। जब छात्र यह समझने लगता है कि उसे क्यों और कैसे पढ़ना है, तब पढ़ाई बोझ नहीं, बल्कि लक्ष्य की ओर बढ़ता हुआ कदम बन जाती है। इन्हीं बढ़े हुए कदमों से छात्र अपने लक्ष्य को प्राप्त करता है।
कई बार विद्यार्थी असफलता से घबरा जाते हैं और स्वयं को कमजोर मानने लगते हैं। यहाँ मार्गदर्शन उन्हें यह सिखाता है कि असफलता अंत नहीं, बल्कि सीखने का अवसर है। सही सलाह आत्मविश्वास लौटाती है और आगे बढ़ने का साहस देती है।
पुस्तकें ज्ञान प्राप्ति का अच्छा स्रोत है इसे नकारा नहीं जा सकता, परन्तु जीवन की अनेक परिक्षाएं इस ज्ञान से उत्तीर्ण करना थोड़ा मुश्किल हो जाता है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली पर गौर करें तो यह पुस्तकों के साथ सामाजिक व व्यवहारिक पहलुओं को भी लेकर चलती हैं। अतः यह आवश्यक है कि छात्र केवल पुस्तकों पर निर्भर न रहें, बल्कि शिक्षक, अभिभावक और अनुभवी लोगों के मार्गदर्शन को महत्व दें। विद्यार्थी जीवन में सही दिशा में किया गया छोटा प्रयास भी भविष्य को उज्ज्वल बना सकता है।
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