जब जीवन स्वयं गुरु बन जाता है

"जीवन भी अद्भुत माया है, इस दुनिया के रंगमंच की।
कभी छिपाती भावों को, कभी गुरु बन ज्ञान सिखाती।" (प्रवीन)
जीवन केवल घटनाओं का क्रम नहीं है, बल्कि अनुभवों की एक ऐसी पाठशाला है जहाँ हर दिन कुछ नया सिखाया जाता है। हम अक्सर ज्ञान की खोज में बाहर भटकते हैं—कभी किसी पुस्तक में ज्ञान खोजते हैं, कभी किसी व्यक्ति की बातों में, तो कभी संतों की वाणी में ज्ञान तलाशते हैं। पर धीरे-धीरे समझ आता है कि जीवन स्वयं ज्ञान का भंडार है।सच कहूं तो जीवन भी एक मौन गुरु है, जो बिना बोले हमें बहुत कुछ सिखा देता है।
जब हमारी अपेक्षाएँ टूटती हैं, तब जीवन हमें स्वीकार करना सिखाता है।
जब अपने हमसे दूर हो जाते हैं, तब जीवन आत्मनिर्भर होना सिखाता है।
और जब बार-बार गिरकर भी हम उठते हैं, आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं तब "जीवन" हमें धैर्य और विश्वास का पाठ पढ़ाता है।
हम हमारे अंतरमन में पीड़ा का संचार होता है तब यही पीड़ा हमें जीवन के गुरु होने का अहसास कराती है। जीवन का दुख हमें रोकता है, सोचने पर मजबूर करता है और भीतर झाँकने का अवसर देता है। वही दुख, समय के साथ, हमारी समझ को गहरा करता है। जो बातें उपदेश में कठिन लगती हैं, वे अनुभव में सहज हो जाती हैं और हमारे लिए प्रेरणा का काम करती है।
असफलताएँ भी जीवन की शिक्षाएँ हैं। वे यह सिखाती हैं कि हर मार्ग सीधा नहीं होता, और हर ठहराव अंत नहीं होता। कई बार जो नहीं मिला, वही आगे चलकर सबसे बड़ा संरक्षण बन जाता है। जीवन हमें सिखाता है कि हर “न” के पीछे भी कोई “हाँ” छिपी होती है—बस समय आने पर समझ में आती है।
जब जीवन स्वयं गुरु बन जाता है, तब बाहरी प्रमाण की आवश्यकता नहीं रहती। तब सीख शब्दों से नहीं, अनुभूति से आती है। हम धीरे-धीरे निर्णय कम लेने लगते हैं और समझने ज़्यादा लगते हैं। शिकायतों का स्थान स्वीकार भाव ले लेता है, और प्रश्नों की जगह मौन आ जाता है।
शायद इसी को अध्यात्म कहते हैं—
जहाँ जीवन को बदलने की नहीं,
उसे समझने की इच्छा जागती है।
जीवन तब गुरु बनता है, जब हम उसे ध्यान से सुनना सीख लेते हैं। उसमें ढलकर जीना सीख जाते हैं।इसी विषय पर यहां दो पंक्तियां प्रस्तुत कर रही हूॅं -
"दुख-सुख जीवन की कुंजी है,पाप-पुण्य जीवन का मूल।
गिरकर उठ संभल कर चलना,तब होगा वक्त तेरे अनुकूल।" (प्रवीन)
जीवन पर लिखित यह पंक्तियां भी हमें यही बता रहीं हैं कि जीवन में सुख-दुख का आना जाना तो लगा ही रहता है। लेकिन जो कठिन परिस्थितियों में संभल जाता है वहीं वक्त को अपने अनुकूल बना लेता है। जैसे गुरु से ज्ञान प्राप्त कर शिष्य अपने लक्ष्य को पा लेता है।

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