शिक्षा का वास्तविक अर्थ
पुस्तकीय ज्ञान हमें शिक्षित तो बनाता है, परन्तु उसे पूर्ण रूप से वास्तविक शिक्षा नहीं माना जा सकता। वास्तविक शिक्षा न केवल हमें कक्षा में उत्तीर्ण कराती है, बल्कि जीवन की कठिन परिस्थितियों से भी उबारने का काम करती है।
यदि आज की शिक्षा व्यवस्था पर दृष्टि डालें तो हम देख सकते हैं कि आज की शिक्षा व्यवस्था में सफलता का मापदंड अक्सर अंक, डिग्री और प्रमाण-पत्र बन गए हैं। इनका अपना महत्व अवश्य है, परंतु यदि शिक्षा हमें सही-गलत का विवेक न सिखा पाए, तो उसका उद्देश्य अधूरा माना जाता है। वास्तविक शिक्षा वह है जो हमारे विचारों को परिष्कृत करे और हमें परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालना सिखाए। अक्सर देखा गया है कि मनुष्य किताबों से जो ज्ञान प्राप्त करता है वह उसे पैसा कमाने में तो मददगार बन जाता है। लेकिन जीवन की विविध परिस्थितियों में उस ज्ञान से काम नहीं चलता। क्योंकि किताबी ज्ञान विषय से बंधा होता है, जबकि जीवन की विविध परिस्थितियां उससे भिन्न भी होती है। वास्तविक शिक्षा उसे कहा जाएगा जो हमें जीवन की विकट परिस्थिति में भी संभाल सके।
वास्तव में देखा जाए तो जीवन स्वयं एक महान शिक्षक है।जहाँ एक तरफ असफलताएँ हमें धैर्य सिखाती हैं, वहीं संघर्ष हमें आत्मबल प्रदान करता है और अनुभव हमें वह ज्ञान देता है जो किसी पाठ्यपुस्तक में नहीं मिलता। जो विद्यार्थी इन अनुभवों से सीख लेता है, वही वास्तव में शिक्षित कहलाता है।
शिक्षा का उद्देश्य केवल आजीविका कमाना नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार, संवेदनशील और आत्मनिर्भर व्यक्ति बनाना होना चाहिए। जब शिक्षा हमें दूसरों के प्रति सहानुभूति, सत्य के प्रति निष्ठा और अपने कर्तव्यों के प्रति सजग बनाती है, तभी वह अपने वास्तविक अर्थ को प्राप्त करती है।
शिक्षा के पहलुओं पर विचार करने के उपरान्त हम यही कह सकते हैं कि हमें शिक्षा को केवल परीक्षा तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि उसे जीवन के हर क्षेत्र में उतारने का प्रयास करना चाहिए। ताकि हम सही अर्थ में खुद को शिक्षित कह पाए। यही शिक्षा का वास्तविक और स्थायी स्वरूप कहा जाएगा।
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