"गुरु बिना यह जीवन कैसा, गुरु बिन कैसा भाव"
"गुरु बिन यह जीवन कैसा, गुरु बिन कैसा भाव"
मानव जीवन झूठ और सत्य के बीच उलझा रहता है।मन के वशीभूत झूठ और सत्य का तांडव जीवनपर्यंत चलता रहता है।झूठ जीवन में छोटी सी खुशी तो दे सकता है, परन्तु यह लम्बे समय तक टिक नहीं सकता। उपरोक्त पंक्ति पर यदि एक दृष्टि डालें तो यह केवल एक भाव नहीं, बल्कि जीवन के उस सत्य को प्रकट करती है, जिसे मन अक्सर अनुभव तो करता है, पर शब्द नहीं दे पाता। गुरु के बिना जीवन चलता तो है, लेकिन वह स्थिरता और संतुलन नहीं आ पाता, जो आत्मिक शांति के लिए आवश्यक है।
गुरु का अर्थ केवल ज्ञान देने वाला नहीं होता। गुरु ज्ञान का असीम सागर है। गुरु वह होता है जो हमारे भीतर फैले अज्ञान, भ्रम और असमंजस को दूर कर, हमें सही दृष्टि प्रदान करता है। जीवन में हम बहुत कुछ सीखते हैं—कर्म करना, संबंध निभाना, जिम्मेदारियाँ उठाना—पर कैसे स्वयं को समझना है, यह गुरु ही सिखाता है।
गुरु के बिना जीवन अक्सर बाहरी परिस्थितियों के अधीन हो जाता है।
मन कभी इच्छाओं में उलझता है, कभी अपेक्षाओं में, और कभी निराशा में। ऐसे में भाव स्थिर नहीं रह पाते। वे कभी अहंकार बन जाते हैं, तो कभी दुख का कारण।
गुरु ही है जो भाव को दिशा देता है। हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
जिस प्रकार नदी को तट मिलने से उसका प्रवाह नियंत्रित होता है, उसी प्रकार भाव को गुरु मिलने से जीवन संयमित होता है। गुरु सिखाता है कि प्रेम कैसे किया जाए । बिना आसक्ति के, सेवा कैसे की जाए, बिना दिखावे और प्रपंच के भक्ति कैसे की जाए। भक्ति भाव में स्वार्थ का न होना ही गुरु के ज्ञान को आत्मसात कराने का कारण बनता है।
जीवन में जब कठिन समय आता है, तब गुरु का महत्व और अधिक स्पष्ट हो जाता है।
जब अपने ही प्रश्न भारी लगने लगें और निर्णय लेने की शक्ति कमजोर पड़ जाए, तब गुरु का एक वचन, एक संकेत या कभी-कभी केवल मौन ही असहाय विचलित मन को संभाल लेता है।
गुरु जीवन की हर समस्या का समाधान नहीं देता, बल्कि वह हमें समस्याओं को देखने की सही दृष्टि प्रदान करता है।
और यही दृष्टि जीवन को हल्का और सार्थक बना देती है।जिस प्रकार विद्या प्राप्ति में शिक्षक सहायक होता है उसी प्रकार अध्यात्म के सफ़र में निकले जीव को गुरु रास्ता दिखाता है।
देखा जाए तो आज के समय में जानकारी तो बहुत है, पर विवेक की कमी दिखाई देती है, ऐसे में गुरु की आवश्यकता और भी बढ़ जाती है। गुरु हमें बाहरी दौड़ से हटाकर भीतर की यात्रा पर ले जाता है, जहाँ वास्तविक शांति का अनुभव होता है।
निष्कर्षतः,
“गुरु बिना ये जीवन कैसा, गुरु बिन कैसा भाव”
यह पंक्ति हमें यह स्मरण कराती है कि गुरु जीवन में केवल एक सहारा नहीं, बल्कि आधार है। गुरु के साथ जीवन में गहराई आती है, भाव शुद्ध होते हैं और जीवन सार्थक दिशा प्राप्त करता है। शुद्ध व निःस्वार्थ भाव गुरु कृपा से ही प्राप्त होते हैं। परम संत कबीरदास जी ने तो गुरु का स्थान गोविंद से भी ऊंचा बताया हैं। सभी संत महात्माओं की वाणियों का निष्कर्ष भी यही निकलता है कि गुरु के बिना मानव अपने आध्यात्मिक सफ़र के लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकता। अतः जीवन में 'गुरु' का स्थान ऊंचा माना गया है।
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