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माफ़ी: जिंदगी की उलझन या सुलझन

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"माफ़ी" शब्द विचारों का मंथन करता है।इसका एक पहलू से आंकलन मुश्किल है।देखा जाए तो मनुष्य का जीवन रिश्तों, भावनाओं और अनुभवों का एक सुंदर मिश्रण है। इस सफर में कभी प्रेम मिलता है, तो कभी तकरार। कभी शब्द दिलों को जोड़ देते हैं, तो कभी वही शब्द दूरियाँ पैदा कर देते हैं। ऐसे में एक छोटा-सा शब्द —"Sorry" अर्थात् “माफ़ी” — कई बिगड़ी बातों को सँवारने की ताकत रखता है।पर इसी दृष्टिकोण को दूसरे नजरिए से देखें तो क्या माफ़ी सच में ज़िन्दगी सँवार देता है या उसे और उलझा देता है? परन्तु जब ऐसे विचार मन में गुलाटियां मारने लगे तब प्रश्न खड़ा होता है कि माफ़ी ज़िन्दगी की उलझन है या सुलझन? आएंगे इसके विभिन्न पक्षों पर दृष्टि डालें - माफ़ी: कमजोरी नहीं, समझदारी है अक्सर लोग यह मान लेते हैं कि माफ़ी माँगना हार मान लेना है। उन्हें लगता है कि झुकने वाला व्यक्ति कमजोर होता है। जबकि सच इसके बिल्कुल विपरीत है। माफ़ी वही व्यक्ति माँग सकता है, जिसमें अपने अहंकार से ऊपर उठने का साहस हो। अपनी गलती स्वीकार करना हर किसी के बस की बात नहीं होती। कई बार रिश्ते इसलिए टूट जाते हैं क्योंकि...

"संतमत में नाम का महत्त्व"

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"राम नाम तू ले ले बन्दे, कष्टों से छुट जाएगा। अंत समय धन-दौलत सब छूटे,नाम ही संग जाएगा।"(प्रवीन) "नाम" के विषय में क्या ही कहूँ नाम आधार भी है " नाम" साधन भी है। यदि अपने चारों ओर देखें तो "नाम" पहचान है मानव समाज की। जब किसी को नाम से पुकारा जाता है, तो उम्मीद की जाती है कि वह आपकी आवाज़ पर प्रतिक्रिया दे। ताकि आप उससे जुड़ सकें,उसको अपनी बात बता सके। एक साधारण सी बात लगती है, लेकिन इसके भीतर एक गहरा आध्यात्मिक संकेत छुपा है। जिस प्रकार हम अपने नाम से जुड़ते हैं, उसी प्रकार आत्मा भी अपने असली "नाम" के माध्यम से परमात्मा से जुड़ती है। मनुष्य का जीवन बाहरी पहचान में बीत जाता है—नाम, प्रतिष्ठा, रिश्ते और जिम्मेदारियाँ। इन सबके बीच हम स्वयं को जानने का समय ही नहीं निकाल पाते। मन हर पल किसी न किसी विचार में उलझा रहता है, और भीतर की शांति धीरे-धीरे धुंधली हो जाती है। मन विचलित सा हो जाता है। ऐसे में जब जीवन प्रश्न पूछता है—"मैं कौन हूँ?"—तो उत्तर बाहर नहीं, भीतर की खोज द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है । संतमत इसी खोज क...